इतना मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि चने के पौधे होते हैं, पेड़ नहीं होते। चने का जंगल नहीं होता, खेत होते हैं। चने के झाड़ पर चढ़ने वाली बात सरासर गलत है, कपोल कल्पना है। इससे आगे चने के बारे में मेरी जानकारी इतनी ही है, जितनी हर बेसन खाने वाले की होती है कि वाह क्या बात है आदि। मुझसे यदि चने पर भाषण देने के लिए कहा जाए, तो मैं कुछ यों शुरू करूँगा कि भाइयो, जिस तरह सूर्य मेरे मकान के इस बाजू उगकर उस बाजू डूब जाता है, उसी तरह चना भी खेत में उगकर आदमी अथवा घोड़े के मुँह में डूब जाता है। इतना कहकर मैं अपना स्थान ग्रहण कर लूँगा- यह भय बताकर कि समय अधिक हो रहा है। बात यह है कि मेरे मुँह में पानी आ जाने के कारण, अधिक बोल नहीं सकूँगा। चना मेरी कमजोरी है। यह कमजोरी मुझे ताकत देती है। सिर्फ खाते समय, बोलते समय नहीं।
पर इधर शहर के अखबारों में चने की चर्चा जरा जोरों पर है। इन दिनों मौसम खराब रहा। हम तो घर में घुसे रहे। पर पता नहीं कि बाहर पानी गिरा और ठंड बढ़ गई। इसका नतीजा यह हुआ कि शहर के आसपास चने के खेत में इल्ली लग गई। अख़बारों में शोर हुआ कि चने में इल्ली लग गई है और सरकार सो रही है वगैरह। एक अखबार ने चने के पौधे पर बैठी इल्ली की तस्वीर भी छापी, जिसमें इल्ली सचमुच में सुंदर लग रही थी। चना हमने भी कम नहीं खाया, पर देखिए पक्षपात कि तस्वीर इल्ली की ही छपी।
मैं इल्ली के विषय में कुछ नहीं जानता। कभी परिचय का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ। इल्ली से बिल्ली और दिल्ली तक की तुक मिलाकर एक बच्चों की कविता लिख देने के सिवाय मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ, पर लोग थे कि इल्ली का जिक्र ऐसे इत्मीनान से करते थे, जैसे पड़ोस में रहती हो।
मेरे एक मित्र हैं। ज्ञानी हैं यानी, पुरानी पोथियाँ पढ़े हुए हैं। मित्रों में एकाध मित्र बुद्धिमान भी होना चाहिए। इस नियम को मानकर मैं उनसे मित्रता बनाए हुए हूँ। एक बार विद्वता की झोंक में उन्होंने बताया था एक नाम 'इला।' कह रहे थे कि अन्न की अधिष्ठात्री देवी है इला यानी पृथ्वी। मुझे बात याद रह गई। जब इल्ली लगने की खबरें चलीं, तो मैं सोचने लगा कि 'इला' का 'इल्ली' से क्या संबंध? इला अन्न की अधिष्ठात्री देवी हैं और इल्ली अन्न की नष्टार्थी देवी। धन्य हैं, ये इल्लियाँ इसी इला की पुत्रियाँ।
अपनी ममी मादाम 'इला' की कमाई खाकर अख़बारों में पब्लिसिटी लूट रही हैं। मैं अपने इस इला-इल्ली ज्ञान से प्रभावित हो गया और सोचने लगा कि कोई विचार गोष्ठी हो, तो मैं अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करूँ, पर ये कृषि विभाग वाले अपनी गोष्ठी में हमें क्यों बुलाने लगे?
जब अख़बारों ने शोर मचाया तो नेताओं ने भी भाषण शुरू किए या शायद नेताओं ने भाषण दिए, तब अख़बारों ने शोर मचाया। पता नहीं पहले क्या हुआ? खैर सरकार जागी, मंत्री जागे, अफ़सर जागे, फाइल उदित हुई। बैठकें चहचहाई, नींद में सोए चपरासी केंटीन की ओर चाय लेने चल पड़े। वक्तव्यों की झाडुएँ सड़कों पर फिरने लगीं। कार्यकर्ताओं ने पंख फड़फड़ाए और वे गाँवों की ओर उड़ चले। सुबह हुई। रेंगती हुई रिपोर्टों ने राजधानी को घेर लिया और हड़बड़ा कर आदेश निकले। शहर के आसपास यह होता रहा पर बंदा अपना छह पृष्ठ का अख़बार दस पैसों में पढ़ता यहीं बैठा रहा।
एक दिन एक कृषि अधिकारी ने कहा, "चलो इल्ली उन्मूलन की प्रगति देखने खेतों में चलो। तुम भी बैठो हमारी जीप में।" मैंने सोचा, चलो इसी बहाने पता लग जाएगा कि चने के पौधे होते हैं या झाड़ और मैं जीप में सवार हो लिया। रास्ते भर मैं उनके विभाग के अन्य अफसरों की बुराइयाँ करता, उनका मनोरंजन करता रहा। कोई डेढ़ घंटे बाद हम एक ऐसी जगह पहुँच गए, जहाँ चारों तरफ खेत थे। वहाँ एक छोटा अफ़सर खड़ा इस बड़े अफ़सर का इंतजार कर रहा था। हम उतर गए। मैंने गौर से देखा, चने के पौधे होते हैं, खेत होते हैं।
हम पैदल चलने लगे। चारों ओर खेत थे। मैंने एक किसान से पूछा, “तुम खेतों को खोदते हो तो क्या निकलता है?"
वह समझा नहीं। फिर बोला, “मिट्टी निकलती है।" "इसका मतलब है प्राचीन काल में भी यहाँ खेत ही थे," मैंने कहा। मेरी जरा इतिहास में रुचि है। खुदाई करने से इतिहास का पता लगता है। अगर खुदाई करने से नगर निकले, तो समझना चाहिए कि यहाँ प्राचीन काल में नगर और सिर्फ मिट्टी निकले तो समझना चाहिए कि खेत थे।
आगे-आगे बड़ा अफसर से बात करता जा रहा था।
"इस खेत में तो इल्लियाँ नहीं हैं?" बड़े अफसर ने पूछा।
"जी नहीं हैं" छोटा अफ़सर बोला।
"कुछ तो नजर आ रही हैं।"
"जी हाँ, कुछ तो हैं।"
"कुछ तो हमेशा रहती हैं।"
"खास नुकसान नहीं करतीं।''
"फिर भी खतरा है।"
"कभी भी बढ़ सकती हैं।"
"जी हाँ, बढ़ सकती हैं।"
"सुना है, सारा खेत साफ कर देती हैं।"
"बिलकुल साफ कर देती हैं।"
"इस खेत पर छिड़काव हो जाना चाहिए।"
"जी हाँ, हो जाना चाहिए।"
"तुम्हारा क्या खयाल है?"
"जैसा आप फरमाएँ।" छोटे अफसर ने नम्रता से कहा। फिर वे दोनों चुपचाप चलने लगे।
"जैसी पोजीशन हो मुझे बताना, मैं हुक्म कर दूंगा।"
"मैं जैसी पोजीशन होगी, आपके सामने पेश कर दूंगा।"
"और सुनो।"
"जो हुक्म।"
"मुझे चना चाहिए, हरा बूट। घर ले जाना है। जीप में रखवा दो।"
"अभी रखवाता हूँ।
"छोटा अफ़सर किसान की तरफ लपका।"
"ओय, क्या नाम है तेरा।"
किसान भाग कर पास आया। छोटे अफसर ने उससे घुड़ककर कहा, "अबे तेरे खेत में इल्ली है?"
"नहीं है हुजूर"
“अबे थी ना, वो कहाँ गई?"
"हुजूर पता नहीं कहाँ गई?"
“अबे बता, कहाँ गई सब इल्लियाँ?"
किसान हाथ जोड़कर काँपने लगा। उसे लगा इस अपराध में उसका खेत जब्त हो जाएगा। छोटे अफसर ने क्रोध से सारे खेत की ओर देखा और फिर बोला, "अच्छा खैर, जा, हरा हरा चना छाँटकर साहब की जीप में रखवा दे। चल जरा जल्दी कर।"
किसान खेत से चने के पौधे उखाड़ने लगा। छोटा अफसर उसके सिर पर तना पड़ा था। इधर मैं और बड़ा अफ़सर चहलकदमी करते रहे। वह बोला, "मुझे खेतों में अच्छा लगता है। यहाँ सचमुच जीवन है, शांति है, सुख है।" वह जाने क्या-क्या बोलने लगा। उसने मुझे मैथिलीशरण गुप्त की ग्राम जीवन पर लिखी कविता सुनाई जो उसने कभी आठवीं कक्षा में रटी थी। कहने लगा, "मेरे मन में जब यह कविता उठती है, मैं जीप पर सवार होकर खेतों में चला आता हूँ।'' मैं बूटे तोड़ते किसान की ओर देखता सोचने लगा-"गुप्तजी को क्या पता था कि वे कविता लिखकर क्या नुकसान करवा देंगे।"
कुछ देर बाद हम लोग जीप पर सवार हो आगे बढ़ गए। किसान ने हमें जाते देख राहत की साँस ली। जीप में हरे चनों का ढेर पड़ा था। मैं खाने लगा वे लोग भी खाने लगे। एकाएक मुझे लगा कि जीप पर तीन इल्लियाँ सवार हैं, जो खेतों की ओर चलीं।